खनन नीति में भ्रष्टाचार: सरकार और माफियाओं की मिलीभगत उजागर

विकासनगर: जन संघर्ष मोर्चा अध्यक्ष एवं जीएनवीएन के पूर्व उपाध्यक्ष रघुनाथ सिंह नेगी ने पत्रकार वार्ता में सरकार की खनन नीति और उससे जुड़े घोटालों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि धामी सरकार ने सत्ता संभालने के मात्र तीन महीने के भीतर 21 अक्टूबर 2021 को उत्तराखंड खनन नीति में बड़े बदलाव किए, जिससे खनन माफियाओं को सीधा लाभ पहुंचा। इस नीति के तहत नदी किनारे निजी नाप भूमि में समतलीकरण, रीसाइक्लिंग टैंक और मत्स्य तालाब निर्माण को खनन परिभाषा से बाहर कर दिया गया। इससे जारी लाइसेंस की अवधि एक वर्ष से बढ़ाकर पांच वर्ष कर दी गई, साथ ही पर्यावरणीय अनुमति की अनिवार्यता को भी समाप्त कर दिया गया।
सरकार ने माफियाओं को लाभ पहुंचाने के लिए अन्य स्रोतों से प्राप्त रॉयल्टी ₹506 प्रति टन से घटाकर ₹70 प्रति टन कर दी और भारी मशीनों से खनन की भी अनुमति दे दी। इससे सरकार को हजारों करोड़ रुपये के राजस्व की हानि हुई।
उच्च न्यायालय का दखल और टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले से तुलना
खनन नीति में हुए बदलावों को लेकर दायर जनहित याचिका संख्या 90/2020 पर सुनवाई करते हुए उच्च न्यायालय ने 30 मार्च 2022 को खनन गतिविधियों को रोकने का आदेश दिया। एक अन्य जनहित याचिका पर 31 मार्च 2023 को उच्च न्यायालय ने सरकार और सीबीआई को नोटिस जारी किया। इसके बाद, सरकार को खनन नीति रद्द करनी पड़ी, और न्यायालय ने इसे टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले के समान माना।
सरकार की एसएलपी और उसकी वापसी
खनन माफियाओं को बचाने के लिए धामी सरकार ने आनन-फानन में सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर कर दी। लेकिन इस याचिका में सरकार को भारी आलोचना का सामना करना पड़ा और अंततः 11 सितंबर 2023 को अपनी एसएलपी वापस लेनी पड़ी।
नेगी ने कहा कि सरकार को उच्च न्यायालय के निर्देशों का पालन कर जनहित में निर्णय लेना चाहिए था, लेकिन ऐसा न कर उसने माफियाओं से अपनी मिलीभगत जगजाहिर कर दी। यह स्पष्ट हो गया कि प्रदेश में नीतियां जनता के हित में नहीं, बल्कि माफियाओं को लाभ पहुंचाने के लिए बनाई जा रही हैं।
मोर्चा जारी रखेगा संघर्ष
जन संघर्ष मोर्चा ने ऐलान किया कि वह सरकार और खनन माफियाओं की मिलीभगत का आगे भी पर्दाफाश करता रहेगा। पत्रकार वार्ता में दिलबाग सिंह और प्रवीण शर्मा पिन्नी भी मौजूद थे।